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बजरंग बाण (Bajrang Baan)

यह बजरंग-बाण जेहि मारै। ताहि कहौ फिरि कवन उबारै॥ पाठ करै बजरंग-बाण की। हनुमत रक्षा करै प्रान की॥ यह बजरंग बाण जो जापैं। तासों भूत-प्रेत सब कापैं॥ धूप देय जो जपै हमेसा। ताके तन नहिं रहै कलेसा॥

बजरंग बाण
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आज की तिथिश्रावण शुक्ल द्वादशी 🌒

॥ दोहा ॥

निश्चय प्रेम प्रतीति ते,

बिनय करैं सनमान ।

तेहि के कारज सकल शुभ,

सिद्ध करैं हनुमान॥

॥ चौपाई ॥

जय हनुमंत संत हितकारी ।

सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ॥

जन के काज बिलंब न कीजै ।

आतुर दौरि महा सुख दीजै ॥

जैसे कूदि सिंधु महिपारा ।

सुरसा बदन पैठि बिस्तारा ॥

आगे जाय लंकिनी रोका ।

मारेहु लात गई सुरलोका ॥

जाय बिभीषन को सुख दीन्हा ।

सीता निरखि परमपद लीन्हा ॥

बाग उजारि सिंधु महँ बोरा ।

अति आतुर जमकातर तोरा ॥

अक्षय कुमार मारि संहारा ।

लूम लपेटि लंक को जारा ॥

लाह समान लंक जरि गई ।

जय जय धुनि सुरपुर नभ भई ॥

अब बिलंब केहि कारन स्वामी ।

कृपा करहु उर अन्तर्यामी ॥

जय जय लखन प्राण के दाता ।

आतुर ह्वै दुःख करहु निपाता ॥

जै गिरिधर जै जै सुख सागर ।

सुर-समूह-समरथ भटनागर ॥

ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले ।

बैरिहि मारु बज्र की कीले ॥

गदा बज्र लै बैरिहिं मारो।

महाराज प्रभु दास उबारो॥

ॐ कार हुंकार महाप्रभु धावो ।

बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो ।

ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीशा ।

ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर शीशा ॥

सत्य होहु हरि शपथ पायके ।

राम दूत धरु मारु जाय के ॥

जय जय जय हनुमंत अगाधा ।

दुःख पावत जन केहि अपराधा ॥

पूजा जप तप नेम अचारा ।

नहिं जानत हौं दास तुम्हारा ॥

वन उपवन मग गिरि गृह माहीं ।

तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं ॥

पांय परौं कर जोरि मनावौं ।

येहि अवसर अब केहि गोहरावौं ॥

जय अंजनि कुमार बलवंता ।

शंकर सुवन वीर हनुमंता ॥

बदन कराल काल कुल घालक ।

राम सहाय सदा प्रतिपालक ॥

भूत, प्रेत, पिशाच निशाचर ।

अग्नि बेताल काल मारी मर ॥

इन्हें मारु, तोहि शपथ राम की ।

राखउ नाथ मरजाद नाम की ॥

जनकसुता हरि दास कहावो ।

ताकी शपथ बिलंब न लावो ॥

जै जै जै धुनि होत अकासा ।

सुमिरत होय दुसह दुःख नाशा ॥

चरण शरण कर जोरि मनावौं ।

यहि अवसर अब केहि गोहरावौं ॥

उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई ।

पाँय परौं, कर जोरि मनाई ॥

ॐ चं चं चं चं चपल चलंता ।

ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता ॥

ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल ।

ॐ सं सं सहमि पराने खल दल ॥

अपने जन को तुरत उबारो ।

सुमिरत होय आनंद हमरो ॥

यह बजरंग बाण जेहि मारै ।

ताहि कहो फिरि कौन उबारै ॥

पाठ करै बजरंग बाण की ।

हनुमत रक्षा करै प्रान की ॥

यह बजरंग बाण जो जापै ।

ताते भूत-प्रेत सब कापैं ॥

धूप देय जो जपै हमेशा ।

ताके तन नहिं रहै कलेशा ॥

॥ दोहा ॥

प्रेम प्रतीतिहि कपि भजै,

सदा धरै उर ध्यान।

तेहि के कारज सकल शुभ,

सिद्ध करैं हनुमान ॥

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